समाजसेवा के नाम पर ‘आप’ का नाम चमका रहे केजरीवाल

Ankur Shrivastav | Apr 05, 2013

kejriwal shining politics in the name of social work

एक समय था जब अरविंद केजरीवाल अनशन का ऐलान करते थे तो सरकारी खेमे में हड़कंप मच जाता था। सरकार के नुमाइंदे केजरीवाल से बात करने पहुंच जाते थे और उन्‍हें अनशन तोड़ने की सलाह देते थे। मगर इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ। 14 दिन के अनशन के बाद आज केजरीवाल ने खुद ही अनशन तोड़ने की घोषणा कर दी और वो भी बिना किसी नतीजे के। खास बात तो यह है कि केजरीवाल के अनशन के दौरान सरकार का कोई भी हुक्‍मरान उनसे उनकी हालत तक पूछने नहीं आया। हालांकि केजरीवाल ने यह भी ऐलान किया है कि अनशन तोड़ने के साथ ही साथ उनके आंदोलन का दूसरा चरण आरंभ हो जायेगा मगर सोचने वाली बात यह है कि क्‍या दूसरे चरण का आंदोलन किसी नतीजे पर पहुंचेगा?

5 अप्रैल 2011 तो याद ही होगा जब केजरीवाल टीम अन्‍ना के सदस्‍य थे। जन लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर दिल्‍ली के जंतर-मंतर पर अन्‍ना हजारे के साथ केजरीवाल भी आमरण अनशन पर बैठे थे। महज 98 घंटे में सरकार हिल गई और लोकपाल बिल को लेकर अधिसूचना जारी की दी गई। 25 जुलाई 2012 को अरविंद केजरीवाल एक बार फिर अन्‍ना हजारे के साथ अनशन पर बैठे। नौ दिन बाद कोई निष्‍कर्ष न निकलता देख अन्‍ना हजारे और अरविंद केजरीवाल ने अनशन तोड़ दी। इस अनशन के दौरान ही केजरीवाल ने राजनीति में आने का संकेत दे दिया था।

केजरीवाल के अनशन के परिणाम ने यह साफ कर दिया है कि आम आदमी पार्टी के पास सरकार को सोचने पर मजबूर कर देने वाला कोई मुद्दा नहीं है। या फिर यह भी हो सकता है कि अनशन और समाजसेवा की आड़ में केजरीवाल आपनी पार्टी की पहुंच दिल्ली के हर कोने में बनाना चाहते हों ताकि जब चुनाव का ऐन वक्त आए तो ये लड़ाई पूरी ताकत से लड़ी जा सके और राजनीति चमकाई जा सके।

 

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Ankur Shrivastav

मास मीडिया के अलग-अलग प्‍लेटफॉर्म में 4 साल अनुभव लिये अंकुर कुमार श्रीवास्‍तव वेब पत्रकारिता में सक्रिय हैं। इन्‍हें राजनैतिक मुद्दों पर अच्‍छी पकड़ है। इन्‍होंने दैनिक अखबार जनसत्‍ता में काम किया है और फिलहाल न्‍यूज बेबसाइट वनइंडिया में सीनियर जर्नलिस्ट के तौर पर कार्यरत हैं। कलम ही इनका शौक है और कलम ही इनकी पहचान।