शिष्टाचार की सीमाओं को लांघते दिग्विजय सिंह

Vivek Shukla | Jul 09, 2013

शिष्टाचार की सीमाओं को लांघते दिग्विजय सिंहएक दौर में दिग्विजय सिंह पढ़े-लिखे इंसान लगते थे। जाहिर तौर पर पढ़े –लिखे इंसान से उम्मीद रहती है कि वह शिष्ट होगा और अगर किसी तरह की कभी टिप्पणी करेगा तो सीमाओं में रहेगा। पर उन्हें पता नहीं क्या हो गया है कि वे अब बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियां करने लगे हैं। वे बार-बार लक्ष्मण रेखा को लांघते हैं।

महाबोधि मंदिर में बम धमाकों की घटना के बाद दिग्विजय सिंह फिर से मैदान में आ गए। वे बेहद गैर-जिम्मेदार अंदाज में कह रहे हैं कि गैर-भाजपा राज्यों को अब सतर्क होना चाहिए। उनके इस बयान के मूल भाव को समझने की जरूरत है। दिग्विजय सिंह ने कश्मीर के पांच लाख पंडितों के पक्ष में कभी एक भी शब्द नहीं बोला। दिग्विजय सिंह तथ्यों को समझे बगैर देश में हर घटने वाली घटनाओं को आएएसएस, विहिप और भाजपा से जोड़कर बयानबाजी क्यों कर रहे हैं? कांग्रेस मुख्यालय के दौरान पार्टी महासचिव जनार्दन द्विवेदी को जूता दिखाने वाले फर्जी पत्रकार सुनील कुमार को दिग्विजय सिंह ने तत्काल आरएसएस और विहिप का आदमी बता डाला। अब जरा देख लीजिए वे किस स्तर तक जाते हैं।

उनकी जुबान पर लगाम लगाना अब लगता है किसी के बस में नहीं है। जानने वाले जानते हैं कि उन्हें कॉलेज के जमाने में जितनी बार उन्हें अनुशासनहीनता संबंधी नोटिस भेजे गए उसका भी कोई मुकाबला नहीं है। दिग्विजय सिंह की बकैती की आदत के चलते उनके अपने दल के नेता भी परेशान हैं। उन्होंने चिदंबरम के साथ भी पंगा लेने की कोशिश की थी। उस दौर में चिदंबरम गृह मंत्री थे। तब दिग्विजय सिंह ने एक अंग्रेजी अख़बार में लेख लिखा। इसमें दिग्गी ने चिदंबरम की माओवादियों से लड़ने की रणनीति पर सवाल खड़े किए थे। कहते हैं, जब चिदंबरम ने उऩकी शिकायत 10 जनपथ में की तो वे चुप हुए।

वे बाबा रामदेव पर जिस तरह से हल्ला बोलते है, उसे कतई शिष्ट नहीं माना जा सकता। जब रामलीला मैदान में पुलिस कार्रवाई की देशभर में आलोचना हो रही थी, तब दिग्विजय सिंह सत्याग्रहियों पर हुई बर्बरता पर संवेदना जताने की बजाय लोगों का मानमर्दन और पगड़ी उछालने का काम कर रहे थे। दिग्विजय सिंह की फिसलती जुबान को देखकर नहीं लगता है कि कांग्रेस के शिखर नेता होने की मर्यादा बची है। उऩ्होंने ही ओसामा-बिन-लादेन को ओसामाजी कहा था। बाबा रामदेव को तो वे ठग कहते हॆं। बात चाहे दिल्ली के बाटला हाउस कांड की हो या मुंबई पर आतंकी हमले की, दिग्विजय सिंह के बयान तकलीफदेह होते हैं। इंस्पेक्टर एमसी शर्मा और हेमंत करकरे जैसे वीर जवानों की शहादत पर भी वह राजनीति करने से बाज नहीं आए।

अब अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुए आंदोलन को ही लें। दिग्विजय सिंह ने संतोष हेगड़े को निशाने पर लिया तो कह गए कि कर्नाटक में तो बहुत मजबूत लोकायुक्त कानून है तो भी उन्होंने क्या कर लिया। उन्होंने अन्ना हजारे को भी चुनौती दे डाली कि यूपी में जाकर कुछ करके दिखाएं। दिग्विजय सिंह की बयानबाजी का सिलसिला काफी पुराना है। लेकिन पहली बार इन पर सबका ध्यान तब केंद्रित हुआ जब वे आजमगढ़ के दौरे पर गए थे। अपने इस दौरे में सिंह उन लोगों के घरों में गए जिन पर आतंकी घटनाओं में शामिल होने के आरोप थे। अब आप उनके बारे में खुद कोई भी राय बना सकते हैं।

 

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लंबे समय से अखबार नवीसी करते हुए और घाट-घाट का पानी पीने के बाद देश-दुनिया के ताजा सूरते -हाल पर बार-बार हर रोज कलम चलाने की चाहत। करीब तीन दशकों से पत्रकारिता । हिन्दुस्तान टाइम्स,पाकिस्तान आर्ब्जवर से दैनिक भास्कर का सफर करने के बाद अब आनलाइन पत्रिका में हाथ आजमाने की ख्वाहिश।