जब मंटो और प्राण की शामें साथ-साथ गुजरती थीं

Vivek Shukla | Jul 13, 2013

जब मंटो और प्राण की शामें साथ-साथ गुजरती थींकम ही लोगों को मालूम है कि सआदत हसन मंटो और प्राण में बहुत घरोपा था। दोनों यारबाश थे। दोनों पंजाबी थे। दोनों में खूबी पटती थी। मंटो ने अपने एक लंबे निबंध में प्राण का विस्तार से जिक्र किया है। पिछली सदी के 40 और 50 के दशक के दौर में दोनों दिग्गजों की कई शामें मुंबई में साथ-साथ गुजरा करती थीं। दोनों साथ-साथ अंगूर की बेटी के साथ इंसाफ करते थे।

प्राण के बारे में मंटो कहते थे,प्राण अच्छा-खासा खुशशक्ल मर्द है। लाहौर में उसकी शोहरत इस वजह से भी थी कि वह बड़ा ही खुशपोश था। बहुत ठाठ से रहता था। उसका तांगा-घोड़ा लाहौर के रईसी तांगों में से सबसे ज्यादा खूबसूरत और दिलकश था।

फिल्मी कलाकार कुलदीप कौर और प्राण के संबंधों पर मंटो लिखते हैं, प्राण से कुलदीप कौर की दोस्ती कब और किस तरह हुई, इसलिए कि मैं लाहौर में नहीं था, लेकिन फिल्मी दुनिया में दोस्तियां कोई अजीब बात नहीं। वहां एक फिल्म की शूटिंग के दौरान एक्ट्रेसों की मित्रता एक ही समय में कई मर्दों से हो सकती है जो उस फिल्म से जुड़े हुए हों।

जब मंटो और प्राण की शामें साथ-साथ गुजरती थीं

 

इनके संबंधों के बारे में मंटो आगे लिखते हैं, … जब बंटवारा हुआ तो कुलदीप कौर और प्राण को अफरा-तफरी में लाहौर छोडऩा पड़ा। प्राण की मोटर (जो गालिबन कुलदीप कौर की मिल्कियत थी) यहीं (लाहौर) रह गई, लेकिन कुलदीप कौर एक हिम्मती औरत है। इसके अलावा उसे यह भी मालूम है कि वह मर्दों को अपनी उंगलियों पर नचा सकती है। इसलिए वह कुछ देर के बाद लाहौर आई और फसादों के दौरान वह मोटर खुद चला कर बंबई ले गई।

महान फसानाकार मंटो कहते हैं, प्राण से जब मेरी मुलाकात श्याम के माध्यम से हुई तो मेरी-उसकी फौरन दोस्ती हो गई। वह बड़ा पाखंड रहित आदमी है।

…कुलदीप कौर से मुझे ज्यादा मिलने-जुलने का इत्तफाक नहीं हुआ। प्राण चूंकि दोस्त था और उसके साथ अक्सर शामें गुजरती थीं। इसलिए कुलदीप भी कभी-कभी हमारे साथ शरीक हो जाती थी। वह एक होटल में रहती थी जो समंदर के किनारे के पास था। प्राण भी उससे कुछ दूर एक स्क्वेयर में ठहरा हुआ था। जहां उसकी बीवी और बच्चा भी था, लेकिन उसका ज्यादा वक्त कुलदीप कौर के साथ गुजरता था।

मंटो साहब के अनुसार, प्राण ताश का खेल फ्लश खेलना बहुत पसंद करते थे। इस बाबत वे एक किस्सा सुनाते हैं। एक बार कुलदीप और प्राण एक साथ थे। प्राण ही पत्ते बांटता था। वही उठाता था और कुलदीप उसके कंधे के साथ अपनी नुकीली ठोड़ी टिकाए बैठी थी। अलबत्ता, जितने रुपये प्राण जीतता था, उठा कर अपने पास रख लेती थी।


ABOUT AUTHOR

Vivek Shukla

लंबे समय से अखबार नवीसी करते हुए और घाट-घाट का पानी पीने के बाद देश-दुनिया के ताजा सूरते -हाल पर बार-बार हर रोज कलम चलाने की चाहत। करीब तीन दशकों से पत्रकारिता । हिन्दुस्तान टाइम्स,पाकिस्तान आर्ब्जवर से दैनिक भास्कर का सफर करने के बाद अब आनलाइन पत्रिका में हाथ आजमाने की ख्वाहिश।