यारबाश मंटो,प्राण और वे बंबई की शामें

Vivek Shukla | Jul 15, 2013

यारबाश मंटो,प्राण और वे बंबई की शामेंकम ही लोगों को मालूम है कि सआदत हसन मंटो और प्राण में बहुत घरोपा था। दोनों यारबाश थे। दोनों पंजाबी थे। दोनों में खूबी पटती थी। एक दौर में मंटो और प्राण की शामें साथ-साथ गुजरती थीं। मंटो ने अपने एक लंबे निबंध में प्राण की शख्सियत का विस्तार से जिक्र किया है। उनके शौक, उनके फिल्म हिरोइन कुलदीप कौर से संबंध और दूसरे पहलुओं पर लिखा। पिछली सदी के 40 और 50 के दशक के दौर में दोनों दिग्गजों की कई शामें मुंबई में साथ-साथ गुजरा करती थीं। दोनों साथ-साथ अंगूर की बेटी के साथ इंसाफ करते थे।

प्राण के बारे में मंटो लिखते हैं,प्राण अच्छा-खासा खुशशक्ल मर्द है। लाहौर में उसकी शोहरत इस वजह से भी थी कि वह बड़ा ही खुशपोश था। बहुत ठाठ से रहता था। उसका तांगा-घोड़ा लाहौर के रईसी तांगों में से सबसे ज्यादा खूबसूरत और दिलकश था।

उस दौर की मशहूर फिल्म अभिनेत्री कुलदीप कौर और प्राण के संबंधों पर मंटो लिखते हैं, “ प्राण से कुलदीप कौर की दोस्ती कब और किस तरह हुई, मुझे इसकी जानकारी नहीं क्योंकि मैं तब लाहौर में नहीं था, लेकिन फिल्मी दुनिया में दोस्तियां कोई अजीब बात नहीं। वहां एक फिल्म की शूटिंग के दौरान एक्ट्रेसों की मित्रता एक ही समय में कई मर्दों से हो सकती है जो उस फिल्म से जुड़े हुए हों।“

मंटो साहब के निबंध पर लौटते हैं, पर पहले जान लेते हैं कुलदीप कौर के बारे में। कहते है कि कुलदीप कौर बला की खूबसूरत महिला थी। उसका जन्म अमृतसर 1926 में हुआ था। उसके पति अमृतसर और लाहौर के बड़े व्यापारी थे। नाम था मोहिन्दर सिंह संधू। उनके पास उस दौर में अनेक विदेशी कारें थीं। शादी के बाद कुलदीप कौर ने स्वीमिंग और इंग्लिश बोलना सीखा। अतसर और लाहौर में कई बंगले। अपने पति के साथ लाहौर में रहने के दौर में कुलदीप का फिल्मों की तरफ रुझान बढ़ा। वहां पर 40 के दशक के शुरू में उनकी प्राण से घनिष्ठता हुई। उन्हीं की पैरवी पर कुलदीप को पंजाबी फिल्म यमला जट्ट में काम करने का मौका मिला। देश के बंटवारे के बाद वह भी मुंबई आ गई। कई हिन्दी-पंजाबी फिल्मों में काम करती रही। पर कोई बड़ी सफलता नहीं मिली। उसका 1960 में टिटनिस होने के कारण निधन हो गया।

आइये फिर बात करते हैं अपने मित्र प्राण पर लिखे मंटो के निबंध पर। वे लिखते हैं, “ … जब बंटवारा हुआ तो कुलदीप कौर और प्राण को अफरा-तफरी में लाहौर छोडऩा पड़ा। प्राण की मोटर (जो गालिबन कुलदीप कौर की मिल्कियत थी) यहीं (लाहौर) रह गई, लेकिन कुलदीप कौर एक हिम्मती औरत है। इसके अलावा उसे यह भी मालूम है कि वह मर्दों को अपनी उंगलियों पर नचा सकती है। इसलिए वह कुछ देर के बाद लाहौर आई और फसादों के दौरान वह मोटर खुद चला कर बंबई ले गई। वह प्राण साहब को इम्प्रेस करना चाहती थी।“

महान फसानाकार मंटो कहते हैं, “ प्राण से मेरी मुलाकात श्याम के माध्यम से हुई। उसके बाद हम दोनों पक्के दोस्त बन गए। बड़ा पाखंड रहित आदमी है प्राण। कुलदीप कौर से अलबत्ता कुछ रस्मी किस्म की मुलाकात रही।“

( श्याम भी गुजरे दौरे के बेहतरीन एक्टर थे। उनका असली नाम श्याम सुंदर चड्ढ़ा था। मंटो और श्याम परम मित्र थे। श्याम ने 1949 में आई बेहद चर्चित फिल्म बाजार में यादगार काम किया था। उसकी 1951 में मौत हो गई थी। श्याम ने एक मुस्लिम लड़की मुमताज कुरैशी से शादी की। उनकी पुत्री सायरा काजमी पाकिस्तान की मशहूर फिलम्मी हस्ती रही )

“ …कुलदीप कौर से मुझे ज्यादा मिलने-जुलने का इत्तेफाक नहीं हुआ। प्राण चूंकि दोस्त था और उसके साथ अक्सर शामें गुजरती थीं। इसलिए कुलदीप भी कभी-कभी हमारे साथ शरीक हो जाती थी। वह एक होटल में रहती थी जो समंदर के किनारे के पास था। प्राण भी उससे कुछ दूर एक स्क्वेयर में ठहरा हुआ था। जहां उसकी बीवी और बच्चा भी था, लेकिन उसका ज्यादा वक्त कुलदीप कौर के साथ गुजरता था।“

मंटो साहब के अनुसार, “ प्राण ताश का खेल फ्लश खेलना बहुत पसंद करते थे। एक बार कुलदीप और प्राण एक साथ थे। प्राण ही पत्ते बांटता था। वही उठाता था और कुलदीप कौर उसके कंधे के साथ अपनी नुकीली ठोड़ी टिकाए बैठी थी। अलबत्ता, जितने रुपये प्राण जीतता था, कुलदीप उठा कर अपने पास रख लेती थी।“


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Vivek Shukla

लंबे समय से अखबार नवीसी करते हुए और घाट-घाट का पानी पीने के बाद देश-दुनिया के ताजा सूरते -हाल पर बार-बार हर रोज कलम चलाने की चाहत। करीब तीन दशकों से पत्रकारिता । हिन्दुस्तान टाइम्स,पाकिस्तान आर्ब्जवर से दैनिक भास्कर का सफर करने के बाद अब आनलाइन पत्रिका में हाथ आजमाने की ख्वाहिश।